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बैसाख की एक दोपहर मैं उनसे मिली थी. जिसे हमेशा गाढ़े प्रेम से पढ़ा हो, जिसके रचे किरदारों की सरलता ने पन्ना-दर-पन्ना इतना सुख दिया हो, उनको जब ख़ुद की आँखों से देखा और पाँव छूने पर माथे के ऊपर उनका हाथ पाया, तो भावावेश में कुछ ना कहा गया. मैं ख़ूब बातूनी हूं, मगर उनके आगे चुप थी.
